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करामाती कोशकार

In Dictionary, English, English, Hindi, Hindi, History, Journalism, Language, Literature, Memoirs, People, Thesaurus by Arvind KumarLeave a Comment

मंज़िल दूर होती गई, इरादा मज़बूत होता गया

मोहन शिवानंद

(रीडर्स डाइजेस्ट के भारतीय संस्करण के प्रधान संपादक हैं)

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प्रकाशनालय दिल्ली प्रैस का वह नौजवान पत्रकार अरविंद कुमार हिंदी कहानी का इंग्लिश अनुवाद करते करते बुरी तरह उलझा था उसे उपयुक्त इंग्लिश शब्द नहीँ सूझ रहे थे. यह था 1952 मेँ अप्रैल महीने का तपता गरम दिन. पास ही बैठा था एक इंग्लिश फ़्रीलांसर. अरविंद की समस्या भाँप कर वह उसे निकट ही कनाट प्लेस मेँ किताबोँ की एक दुकान तक ले गया और एक किताब उसे पकड़ा दी. यह था ठीक सौ साल पहले लंदन मेँ छपा लंबे से नाम वाला – थिसारस आफ़ इंग्लिश वर्ड्स ऐंड फ़्रैजेज़ क्लासिफ़ाइड ऐंड अरेंज्ड सो ऐज़ टु फ़ैसिलिटेट द ऐक्सप्रैशन आफ़ आइडियाज़ ऐंड ऐसिस्ट इन लिटरेररी कंपोज़ीशन. इस का हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार होगा – साहित्यिक रचना और विचारोँ की अभिव्यक्ति मेँ सहायतार्थ सुनियोजित और संयोजित इंग्लिश शब्दों और वाक्यांशोँ का थिसारस (ग्रीक शब्द ‘थिसारस’ का सरल हिंदी अनुवाद तिजौरी भी हो सकता है और महाकोश भी). रोजट्स थिसारस नाम से मशहूर इस किताब के पन्ने पलटते ही अरविंद पर उस का जादू चल गया. तुरंत ख़रीद ली.

उम्र थी बस बाईस साल. पिछले सात साल से पिता की अपर्याप्त आय मेँ थोड़ा बहुत जोड़ने के लिए वह यहीँ काम करता आ रहा था. दसवीँ पास था. शुरूआत की छपे टाइपों को केसों मेँ वापस डालने (यानी डिस्ट्रीब्यूट करने) के काम से. कंपोज़ीटर, कैशियर, टाइपिस्ट, प्रूफ़रीडर, हिंदी पत्रिका सरिता मेँ उप संपादक होता होता वह इतने कम समय मेँ इंग्लिश पत्रिका कैरेवान मेँ उप संपादक बन चुका था. शाम के समय ईवनिंग कालिज मेँ पढ़ता ऐमए (इंग्लिश) की तरफ़ बढ़ रहा था.

वह अनोखी किताब क्या हाथ लगी कि हाथ से छूटती ही नहीँ थी. उस की हमजोली बन गई, हर दम साथ रहती. ज़रूरत पड़ने पर तो उस की मदद लेता ही, बेज़रूरत भी पन्ने पलटता शब्द पढ़ता रहता. बार बार चाह उठती – हिंदी मेँ भी कुछ ऐसा हो. भारत मेँ कोशकारिता की परंपरा पुरानी है. प्रजापति कश्यप का 1800 वैदिक शब्दोँ का संकलन निघंटु था, अमर सिंह का 8,000 शब्दोँ वाला प्रसिद्ध थिसारस अमर कोश था. हिंदी मेँ ऐसा कुछ नहीँ था.

1963 तक अरविंद दिल्ली प्रैस के सभी प्रकाशनोँ का प्रभारी सहायक संपादक बन गया था. टाइम्स आफ़ इंडिया समूह द्वारा संपादक का पद देने की पेशकश सीधे सादे सरलचित्त निरभिमान पत्रकार के लिए यह सुनहरी मौक़ा थी – मुंबई से हिंदी फ़िल्म पत्रिका माधुरी आरंभ करना. “फ़िल्मोँ की जानकारी मुझे कुछ कम ही थी,” वह बेबाक बताता है. “मेरे लिए यह बड़ी चुनौती थी.” पहले अंक से ही माधुरी अग्रतम हिंदी फ़िल्म पत्रिका बन गई.

दस साल बाद 26 दिसंबर 1973. सुबह की सैर पर अरविंद ने अपनी सोई आकांक्षा का ज़िक्र पत्नी कुसुम से किया. “अभी तक तो हिंदी मेँ थिसारस बना नहीँ, मुझे ही बनाना होगा. हिंदी को, समाज को इस की बेहद ज़रूरत है. इस के लिए मुझे नौकरी भी छोड़नी पड़ सकती है. तुम दोगी मेरा साथ?”

दोनोँ बच्चे स्कूल जाते थे, जमा जमाया काम था, दक्षिण मुंबई के एक प्रतिष्ठित भाग मेँ फ़्लैट था. काम जोखिम भरा था. अब तक किसी ने इस मेँ हाथ डालने की हिम्मत नहीँ की थी.

“लेकिन मैँ जीवन भर धर्मेंद्र और हेमा मालिनी के बारे मेँ लिखते छापते रहने के लिए तो पैदा नहीँ हुआ हूँ ना,” अरविंद ने कहा.

“ठीक है,” कुसुम ने बेहिचक जवाब दिया, “पर हमेँ हर क़दम सोच समझ कर उठाना होगा.” तय हुआ कि माधुरी छोड़ने का सही समय लगभग पाँच साल बाद होगा. कार के लिए लिया कर्ज़ तब तक चुक चुका होगा. दिल्ली वापस जाने पर बच्चोँ की पढ़ाई पर बुरा भी असर नहीँ पड़ेगा.

“काम मेँ बस दो साल लगेंगे,” अरविंद ने कहा. “बाद मेँ कोई और काम तो मिल ही जाएगा.” अरविंद का सोचना था कि रोजट के माडल पर हिंदी पर्याय और विपर्याय शब्द डालने से काम चल जाएगा. यह तो बाद मेँ पता चला कि यह माडल हिंदी के काम का नहीँ था.

भावी आर्थिक स्थिति का कोई भरोसा नहीँ था. हर तरफ़ कतरब्योँत की जाने लगी. सादा खाना और सादा हो गया. महँगी चीज़ बस्त की ख़रीद टलने लगी. सोफ़ासैट ख़रीदने का इरादा तर्क़ कर दिया. जब जहाँ सस्ते कपड़े लत्ते मिल ले लिए – क्या पता फिर कब मौक़ा मिले. इसी तरह जितने भी जिस तरह के कोश – हिंदी के इंग्लिश के – मिले ख़रीद लिए. हर तरह का संदर्भ साहित्य चाहिए था.

अप्रैल 1976 मेँ काम का अभ्यास आरंभ हुआ. शब्द संकलन के लिए जिस तरह के कार्ड चाहिए थे, बनवा लिए थे. धार्मिक भावना से नहीँ, महत्वपूर्ण काम की औपचारिक शुरूआत के लिए मुंबई के पास का तीर्थस्थान नासिक चुना गया. गाड़ी मेँ कार्ड और कुछ कोश लाद कर पूरे परिवार ने टाइम्स आफ़ इंडिया के गैस्ट हाउस मेँ डेरा डाला, सुबह सबेरे गोदावरी मेँ स्नान किया, तांबे के लोटे पर तारीख़ अंकित कराई, पहला कार्ड बनाया, जिस पर चारोँ सदस्योँ ने विधिवत दस्तख़त किए. और मुंबई लौट कर अपने सपने को पूरा करने का अभ्यास शुरू किया.

माधुरी छोड़ते समय (मई 1978) बेटा सुमीत मैडिकल कालिज जाइन करने वाला था, बेटी मीता ने आठवीँ पास कर ली थी. सौ से अधिक कोशोँ की संपत्ति लिए परिवार अपने घर दिल्ली (माडल टाउन) पहुँचा. उस मेँ 14 x 14 फ़ुट की छह फ़ुट ऊँची गरमी मेँ बेहद गरम और सर्दी मेँ बेहद ठंडी होने वाली मियानी काम का कमरा बनी. अरविंद और कुसुम ने फिर से ट्रेओँ मेँ रोजट के माडल के अनुरूप सभी के शीर्षकोँ उपशीर्षकों की संख्या वाले कार्ड क़रीने से र लगा दिए.

मुंबई से ही कई ऐसे शब्द मिलने लगे थे जिन के लिए रोजट मेँ जगह नहीँ थी. दिल्ली मेँ तो यह समस्या और भी मुँह बाए खड़ी हो गई. पहले से ही क्रमांकित कार्डोँ को आगे पीछे उलट पलट कर हज़ारोँ नई कोटियोँ के लिए संख्याएँ जोड़ना संभव नहीँ था.

अरविंद समझाते हैँ: “रोजट के माडल मेँ हर संकल्पना का एक सुनिश्चित स्थान है. उस का आधार वैज्ञानिक है. लेकिन भाषा जो भी हो, वैज्ञानिक नहीँ होती. नए नए शब्द विज्ञान के आधार पर नहीँ, मानसिक संबंधों के आधार पर, कई बार बस यूँ ही या सामाजिक अवधारणाओँ पर बनते हैँ. इंग्लिश के रेनी डे का मुख्य अर्थ है ‘कठिन समय’, हमारे यहाँ बरसाती दिन सुहावना होता है, कविता का विषय है, रोमांस का काल है.”

बात आगे बढ़ाते वह कहते हैँ: “विज्ञान मेँ ‘गेहूँ’ एक तरह की घास है, आम आदमी के लिए वह खाद्य अनाज है. संस्कृत से ले कर हिंदी ही नहीँ सभी भारतीय भाषाओँ के अपने अलग सामाजिक संदर्भ हैँ. एक और समस्या यह है कि काव्य की भाषाएँ होने के कारण हमारे यहाँ इंग्लिश के मुक़ाबिले पर्यायोँ की भरमार है.” ‘हलदी’ के लिए अरविंद को 125 पर्याय मिले! ‘हैल्मेट’ के लिए 32.

हमारी अपनी अलग सामाजिक सांस्कृतिक संकल्पनाएँ हैँ. इंग्लिश मेँ ईवनिंग इन पैरिस पैरिस की कोई भी शाम है, हमारे यहाँ शामे अवध की रौनक़ बेमिसाल रंगीन होती थी, सुबहे बनारस मेँ पूजा पाठ शंखनाद का पावन आभास है, तो शबे मालवा सुहावनी ठंडक की प्रतीक है.

एक बार अरविंद का दिल्ली से लगभग तीस-पैँतीस किलोमीटर दूर मुरादनगर जाना हुआ. वहाँ एक कारीगर के मुँह से नया शब्द सुना: बैटरा! – बैटरी का पुंल्लिंग. मतलब था ट्रैक्टर ट्रक आदि मेँ लगने वाली बड़ी बैटरी. हिंदी इसी तरह के सैकड़ोँ अड़बंगे लेकिन बात को सही तरह कहने वाले नए शब्दोँ से भरी है. “इस का अर्थ था कि हिंदी थिसारस बनाना जितना मैँ ने सोचा था, उस से दस गुना कठिन था. पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो दस गुना ज़्यादा दिलचस्प भी.”

ऐसे दसियोँ हज़ार शब्द खोजने और सम्मिलित करने के लिए अरविंद को प्राचीन संस्कृति ही नहीँ समसामयिक समाज मेँ भी पैठना पड़ा. संदर्भोँ और शब्द-संबंधोँ के इन दरीचोँ गलियारोँ मेँ भटकते गुज़रते शब्दोँ को समझते परखते, उन के लिए संकलन मेँ उपयुक्त जगह तलाशते या बनाते संकल्पनाओँ और कार्डोँ की संख्या बढ़ती जा रही थी. दोनोँ सुबह पाँच बजे काम मेँ जुट जाते, शाम तक लगे रहते.

और तब आया 1978 का सितंबर महीना – साथ लाया जमुना नदी की भयंकर बाढ़. एक-मंज़िला घर बाढ़ की चपेट मेँ आ गया. कुछ बचा तो मियानी मेँ रखे कोश और कार्ड. “यह संकेत था कि मुझे इसी मेँ लगे रहना है.” बाढ़ के बाद पिताजी ने वह घर बेच दिया. काम का तबादला दिल्ली से गाज़ियाबाद की नवविकसित कालोनी चंद्रनगर-सूर्यनगर हो गया. वहीँ अरविंद और कुसुम अब तक रहते भी हैँ.

आय कुछ थी नहीँ. प्रोविडैंट फ़ंड से जो पैसा मिला था, उसी पर सूद के सहारे गुज़र हो रही थी. वह भी कम होता जा रहा था. उस का कुछ भाग नई जगह मकान के लिए ज़मीन ख़रीदने मे निकल गया. अब और पैसा ज़रूर ही चाहिए था. संयोगवश रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण सर्वोत्तम निकालने का काम अरविंद ने पाँच साल के लिए स्वीकार कर लिया. “डाइजेस्ट मेँ मेरा कार्यकाल बड़े काम का सिद्ध हुआ. हर छपे शब्द की जाँच पड़ताल, हर तथ्य की सत्यता पर बल – एक नया अनुभव था. यही नहीँ, संपादन का अपना कौशल. किसी भी रचना के बार बार नए ड्राफ़्ट बनाना, माँजना, सँवारना – सब कुछ अनोखा. फिर हिंदी अनुवाद इस तरह करना कि हर लेख मौलिक लगे! मूल रचना का सच्चा दर्पण, हर शब्द सही सटीक. सब कुछ शिक्षाप्रद था.”

1983 मेँ जब मैँ ने डाइजेस्ट जाइन किया तो वह दिल्ली कार्यालय के अध्यक्ष थे. बाद मेँ मैँ ने सहयोगियोँ से सुना कि वह हम संपादकोँ के बीच अनोखे स्कालर-संपादक थे.

रोजट का माडल फ़ेल हो गया तो उन्होँ ने अमर सिंह का माडल आज़माया. पर वह बुरी तरह आउट-आफ़-डेट पुराणकालीन था. उस के मुख्य भाग का आधार वर्णाश्रम व्यवस्था थी. उस मेँ सिंह का संदर्भ क्षत्रिय वर्ण से था, गाय का वैश्य से! संगीत तो नैसर्गिक गतिविधि था, लेकिन गायक था नीच शूद्र!

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1990 तक उन के पास 70 ट्रेओँ मेँ साठ हज़ार कार्डोँ पर लगभग ढाई लाख शब्द थे. तात्कालिक विषयोँ की सभी ट्रे मेज़ोँ पर, बाक़ी दाहिने बाएँ रैकोँ के ख़ानोँ मेँ – लगभग वैसे ही जैसे कंपोज़ीटर के टाइपोँ के केस रखे रहते थे – अरविंद के लड़कपन के दिनोँ मेँ.

कुसुम का काम था हिंदी कोश मेँ से तक जाते जाते वस्तुओँ, वृक्षोँ, देवीदेवताओँ के (मुख्यतः संज्ञाओँ) के शब्द लिखना. अरविंद का काम था भाववाचक संज्ञाओँ, अमूर्त विषयोँ, क्रियाओँ, विशेषणोँ, क्रिया विशेषणोँ, मुहावरोँ को सँभालना… आसपास की ट्रेओँ का क्रम कुछ इस तरह का था- ब्रह्मांड, तारक पिंड, सौर मंडल… या फिर रोटी पराँठे, निरामिष व्यंजन, अंडा मांस व्यंजन, अचार चटनी, मसाले… या जीवन, मृत्यु, अमृत विष, मारण, हत्या, हिंसा, अहिंसा… दृश्य अनुभूति, दृष्टि उपकरण, अवलोकन… प्रकाश, अंधकार… इन मेँ किसी भी मुख्य कोटि की उपकोटियोँ की किसी बेल सरीखी शाखाएँ उपशाखाएँ निकलती हैँ, जैसे अवलोकन से अवलोकन शैली, तिरछी चितवन, सरसरी नज़र… हिंदी मेँ इन सब के कई पर्याय और मुहाविरे भी होते हैँ… सब कुछ अंतहीन सा था. ट्रायल ऐंड ऐरर करते करते अरविंद का अपना माडल निकलने मेँ चौदह साल निकल गए! और यह रोजट के माडल से बिल्कुल भिन्न, पूरी तरह स्वतंत्र, मानव मन के सहज परस्पर संबंधोँ पर आधारित…

अब तक अरविंद का बेटा सुमीत सर्जन बन चुका था और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल मेँ था. एक दिन पति पत्नी उस से मिलने गए. अरविंद को सीने मेँ दर्द हुआ – हार्ट अटैक था. सुमीत ने उन्हेँ तत्काल आईसीयू मेँ दाख़िल करा दिया. “मुझे पता था मुझे कुछ नहीँ होगा,” अरविंद ने कहा “मेरा काम जो बाक़ी था.” ठीक होने के बाद अब काम और महत्वपूर्ण हो गया, तेज़ी आ गई. “हिंदी थिसारस का सही समय आ गया है,” अरविंद अपने मित्रोँ से कहते, “इस के लिए मुझे चुना गया है. न मैँ थिसारस को छोड़ूँगा न थिसारस मुझे. पूरा होने के लिए वह मुझे बचाता रहेगा.”

1991 तक अरविंद को अपूर्ण थिसारस का भावी प्रकाशक मिल गया था. नाम रखा था – समांतर कोश, समांतर अभिव्यक्तियोँ का संकलन. जब भी उस की छपाई और प्रकाशन की समस्याओँ का ध्यान आता, अरविंद को बुख़ार सा चढ़ने लगता. वह स्वयं छापेख़ाने मेँ काम कर चुके थे. छपाई की समस्याएँ जानते समझते थे. पहले कार्ड टाइपिस्टोँ को दिए जाएँगे. टाइपिस्टोँ के हाथोँ उन का क्रम बिगड़ सकता था, कुछ कार्ड खो भी सकते थे. टाइपिंग मेँ ग़लतियाँ छूट जाएँगी. पहले उन के प्रूफ़ पढ़ कर दोबारा टाइप कराना होगा. फिर वे छापेख़ाने जाएँगे, वहाँ जो ग़लतियाँ और घपले होते हैँ, वे भी अरविंद जानते थे. छपते छपते हिंदी टाइपोँ मेँ मात्राएँ टूटने से अर्थ का अनर्थ हो जाता था – यह अरविंद से अधिक कौन जान सकता था… और फिर शब्दोँ का इंडैक्स! संदर्भ खंड छपने के बाद वह कौन कितने समय मेँ बना पाएगा? सारा प्रोजेक्ट चित होता नज़र आता था.

“हमेँ सारा डाटा कंप्यूटरित करना होगा,” सुमीत का कहना था. कहना आसान था, करना नहीँ. कंप्यूटर के लिए पैसे थे कहाँ? उन दिनोँ एक लाख से ज़्यादा का बैठता था. किसी से इतना पैसा मिलने की संभावना नहीँ थी. आख़िर सुमीत ने ईरान के एक अस्पताल मेँ काम ले लिया. लौट कर कंप्यूटर ख़रीदा… कंप्यूटर के लिए प्रोग्रामिंग और भी महँगी शै होती है. अंततः सुमीत ने अपने आप किताबेँ पढ़ पढ़ कर प्रोग्रामिंग सीखी और अरविंद के प्रोजैक्ट मेँ सहायता करने लगा.

कंप्यूटर आते ही नज़ारा बदल गया. एक पूर्णकालिक कर्मचारी ने सुमीत के बनाए डाटाबेस मेँ नौ महीने लगा कर सारा डाटा ऐंटर कर दिया. अब अरविंद की बारी थी. वह कंप्यूटर के कल पेँच समझ चुके थे. टाइपिस्ट तो 1953 से थे ही. अपने लेख टाइपराइटर पर ही लिखते थे. कंप्यूटर के नए कीबोर्ड पर हाथ जमाने मेँ देर नहीँ लगी. नई नई संकल्पनाएँ नए नए शब्द जोड़े जाने लगे. कहीँ कोई दोहराव होता तो कंप्यूटर तुरंत बता देता, एक एक शब्द को इंडैक्स मेँ शामिल कर लेता… और अंत मेँ छपाई के लिए किताब बना कर दे देगा!

दिसंबर 1996 मेँ हिंदी ने पहला और विशाल थिसारस देखा – समांतर कोश. इसे बनाने मेँ दो नहीँ पूरे बीस साल लगे थे. राष्ट्रपति भवन मेँ विशेष समारोह मेँ तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकर दयाल शर्मा को कोश का पहला सैट भेँट किया कुसुम ने, साथ खड़ा था 1952 का वह नौजवान पत्रकार अरविंद. निस्संदेह, प्राचीन निघंटु और अमर कोश से यहाँ तक भारतीय कोशकारिता की यह लंबी यात्रा थी. समांतर कोश को तत्काल सफलता मिली. इसे हिंदी के माथे पर सुनहरी बिंदी कहा गया. एक समालोचक ने इसे शताब्दी की पुस्तक का ख़िताब दिया. एक लिखा- समांतर कोश मेँ से गुज़रना शब्दोँ के मेले मेँ से गुज़रना है.

अरविंद सफलता पर बैठ रहने वालोँ मेँ कभी नहीँ थे. 3,50,000 से अधिक शब्दोँ के डाटा मेँ इंग्लिश अभिव्यक्तियाँ सम्मिलित करने का प्रयाण शुरू हो गया. बेटी मीता न्यूटरीशनिस्ट बन चुकी थी. उस ने समांतर कोश की सभी संकल्पनाओँ के लिए प्रस्तावित इंग्लिश शब्द हाशिए मेँ लिख डाले. “अँगरेजी शब्दावली डालने मेँ इस से मुझे बड़ी सहायता मिली,” अरविंद कहते हैँ.

अब दस और साल लगा कर कुमार दंपति का तीन खंडोँ वाला महाग्रंथ आया – द पेंगुइन इंग्लिश–हिंदी/हिंदी–इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी (2007). अरविंद का एक अन्य उल्लेखनीय कोश है शब्देश्वरी – देवीदेवताओँ के नामोँ का थिसारस. इस मेँ शिव के 2411 नाम हैँ.

और अब इंटरनैट के http://arvindkumar.me पते पर उपलब्ध है अरविंद लैक्सिकन द्विभाषी हिंदी–इंग्लिश–थिसारस. इस मेँ हिंदी शब्द रोमन लिपि मेँ भी पढ़े जा सकते हैँ. जो लोग देवनागरी नहीँ जानते उन के लिए यह एक विशेष सुविधा है. साथ ही तैयार हैँ — टैबलेट, स्मार्ट फ़ोन, सैल फ़ोन और ऐंड्राइड आदि के लिए अलग संस्करण. “सब कुछ पारिवारिक प्रयास है,” अरविंद का कहना है. अब परिवार ने अपनी कंपनी भी खोल ली है – अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. इस की सीईओ (अध्यक्ष) है मीता. (अरविंद लिंग्विस्टिक्स ने अब पेंगुइन इंडिया से द पेंगुइन इंग्लिश–हिंदी/हिंदी–इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के सर्वाधिकार वापस ले लिए हैँ. अब मीता इस का वितरण सँभाल रही है. पता है अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि., ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 110065.)

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दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित अरविंद कुमार को शलाका सम्मान का फलक भेंट कर रही हैँ. सहायता कर रहे हैँ दिल्ली हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रघर

अरविंद को संतोष है कि अब तक समांतर कोश की बीस हज़ार से ज़्यादा प्रतियाँ बिक चुकी हैँ. छठा रीप्रिंट अभी आया है. लेखक, पत्रकार, विज्ञापन कापीराइटर, अध्यापक, विद्यार्थी – सब इस से लाभ उठा रहे हैँ. “जब भी ज़रूरत पड़ती है मैँ अरविंद कुमार के थिसारस के पन्ने पलटता हूँ,” यह कहना है मुंबई के विज्ञापन लेखक और क्रिएटिव ट्रांसलेटर लक्ष्मीनारायण बैजल का (बैजल ने थम्सअप के लिए तूफ़ानी ठंडा जिंगल लिखी है.) “सच तो यह है कि हमारे अनुवादक मेल-समूह का कोई भी सदस्य इस की उपयोगिता सहर्ष बताएगा.”

“अरविंद कुमार का योगदान अमूल्य है,” कहना है दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष और डीन आफ़ कालिजेज़ तथा लोकप्रिय स्तंभ लेखक डाक्टर सुधीश पचौरी का. “मैँ हिंदी भाषा मेँ सक्षम हूँ, फिर भी जब कभी मेरे मन मेँ कोई क्लिष्ट अकादेमिक शब्द आता है, तो आसान शब्द खोजने मेँ थिसारस बड़े काम आता है.”

आश्चर्य नहीँ, कई हिंदी क्षेत्रोँ मेँ अरविंद शब्द कोशकार का पर्याय बन गया है. अरविंद को अनेक साहित्यिक पुरस्कार और सम्मान (महाराष्ट्र हिंदी अकादेमी का महाराष्ट्र भारती अखिल भारतीय हिंदी-सेवा पुरस्कार, हिंदी साहित्य सम्मेलन का डाक्टर हरदेव बाहरी सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, का सुब्रहमन्य भारती पुरस्कार और 2011 मेँ हिंदी अकादेमी (दिल्ली) का सर्वोच्च शलाका सम्मान) भी मिले हैँ.

फिर भी जब इतने सालोँ बाद रीडर्स डाइजेस्ट के अपने पूर्व सहकर्मी अरविंद जी (तब 82 साल) से मैँ मिला, तो उन्हों ने कहा कि उन का काम अभी ख़त्म नहीँ हुआ है. अब भी वह सुबह पाँच बजे उठ कर अपने विशाल डाटा के परिष्कार और संवर्धन मेँ लग जाते हैँ. बड़े बड़े सपने अभी और भी हैँ. इन मेँ से एक है-

सभी प्रमुख भारतीय भाषाओँ को अपने विशाल डाटा मेँ समाने का. आरंभ करना चाहते हैँ तमिल से. और बाद मेँ आकांक्षा है इंग्लिश-इतर विदेशी भाषाओँ के शब्द संकलन की. इस के लिए सुमीत ने कंप्यूटर ऐप्लिकेशन तैयार कर ली है. बढ़ कर यह सुविशाल डाटा ‘शब्दोँ का विश्व बैंक’ बन जाएगा और इस की सहायता से बहुभाषी थिसारस पलक झपकते ही बनाए जा सकेँगे.

“ये सब महान संभावनाएँ हैँ,” कहना है हमारे करामाती कोशकार का. “जब तक भाषाएँ बढ़ती और सँवरती रहेँगी, मेरा काम चलता रहेगा.” ***

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