हिंदी — अगस्त 1947 से 2007 तक…

In Culture, History, Journalism, Literature, Memoirs, People by Arvind KumarLeave a Comment

उस ज़माने के लेखकों कवियों की और आज के लेखकों की वेशभूषा मे में जो अंतर है वही अंतर तब की और अब की भाषा में भी कहा जा सकता था। तब खद्दर का कुर्ता, धोती, पाजामा, लंबे बाल, मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, पंत जी की छवि ही सब लेखकों की छवि थी। आज देखिए क्या लेखक, क्या पत्रकार… सब तरफ़ पतलून, जींस, बुशशर्ट, टी शर्ट…

बिचबिंदु खोली, लौहपथगामिनी और कंठलंगोट जैसे नक़ली शब्द मज़ाक़ बनाए गए। यह बात नज़रअंदाज़ कर दी गई कि शब्द जनता बनाती है, कारीगर बनाते हैं, विद्वान नहीं।

 

पंदरह अगस्त 1947 को मैं साढ़े सतरह वर्ष का उत्साही तरुण था–देशभक्ति और हिंदी प्रेम से भरा था। छापेख़ाने में काम करता था। वहाँ से सरिता का प्रकाशन मेरे सामने 1945 में आरंभ हो चुका था, बाद में मैं उसका सहायक संपादक बनने वाला था, लेकिन 47 में पत्रकारिता से बहुत दूर था। हाँ, अपने कांग्रेस सेवा दल के साथियों के साथ गीता पर चर्चा में मैं ज़रूर कुछ समय बिताता था।  भाषा की बारीक़ियों को कम समझता था, लेकिन हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने की चाह थी। चाह थी कि उस में अँगरेजी शब्द कम से कम हों। उर्दू के शब्दों को भी विदेशी मानता था। उर्दू से द्वेष कुछ इसलिए भी था कि जब मेरी साइकिल खो गई थी तो  थाने में मेरी हिंदी मेँ लिखी शिकायत स्वीकार नहीं की गई थी–कारण कि  उन दिनों सरकारी कामकाज की भाषा उर्दू थी। साथ साथ गाँधी जी के प्रभाव में हिंदुस्तानी का समर्थक भी था। कहना चाहिए मेरे विचार अपरिभाषित थे, और भ्रमित भी। हिंदी कवि सम्मेलनों और मुशायरों में जाने का शौक़ था। इसलिए भाषा में हिंदी और उर्दू दोनों के संस्कार थे। यूँ भी, उन दिनों रोज़मर्रा की बोली में उर्दू के शब्द काफ़ी होते थे हिंदी औरतों की भाषा मानी जाती थी, या रामायण की, पूजापाठ की।

कुछ दोस्तों, कुछ परिचित जनों की रुचि साहित्य में भी थी। मैं भी कविता लिखने की कोशिश करता था। कई साहित्यकारों से भी मुलाक़ात होती थी। उस ज़माने के लेखकों कवियों की और आज के लेखकों की वेशभूषा मे में जो अंतर है वही अंतर तब की और अब की भाषा में भी कहा जा सकता था। तब खद्दर का कुर्ता, धोती, पाजामा, लंबे बाल, मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, पंत जी की छवि ही सब लेखकों की छवि थी। आज देखिए क्या लेखक, क्या पत्रकार सब तरफ़ पतलून, जींस, बुशशर्ट, टी शर्ट तब क़लम, निब वाले पैन, कहीं कही फ़ाउनटेन भी होते थे आजकल बालपैन, कंप्यूटर, ईमेल आमदनी कम होती थी, जीवन शैली सादी। साइकिल भी कम होती थी, अकसर छोटे शहर थे जिन में पैदल या ताँगों से काम चल जाता था आजकल के वाहन ही कुछ और हैंयह जो परिवर्तन है, वैसा ही हिंदी में है।

तब हिंदी में पंडिताऊपन था। साहित्यकार उस से उबारने में लगे थे। पत्रकारों के हाथों में हिंदी में नए शब्द आ रहे थे। तब गवा-गवी, गया-गयी चलते थे, अब गया-गई हो गए हैं। तब की पत्नि अब पत्नी है। श्रीमति जी अब श्रीमती जी हैं।

छपने के लिए रचनाएँ पतले लंबोतरे काग़ज़ की पट्टियों पर लिखी जाती थीं, ताकि कंपोज़ीटर की स्टिक में सरकाई जा सकें। आजकल कंप्यूटर पर सीधे लिखी जाती हैं। तब हैंड कंपोजिग में ग़लतियाँ बहुत होती थीं, शब्दकोश में भी प्रूफ़रीडिंग की ग़लतियाँ मिलना असंभव नहीं था। अब ग़लतियाँ कितने कम होती हैं!

आज़ाद होते ही हिंदी को आधुनिक बनाने के लिए तरह तरह की शब्दावलियाँ बनाने का ज़िम्मा भारत सरकार ने उठा लिया। एक तरफ़ पंडित सुंदरलाल ने हास्यास्पद हिंदुस्तानी कोश बनाया। उस में सैंट्रल कैबिनेट बिचबिंदु खोली बन गई। दूसरी तरफ़ डाक्टर रघुबीर ने इंग्लिश-हिंदी डिक्शनरी बना कर उलटी दिशा दी। संस्कृत की समृद्ध शब्दावली और व्याकरण को आधार बना कर जो हिंदी शब्द बनाने की दिशा और प्रक्रिया उन्हों ने दी, वह आम पाठक के लिए हास्यास्पद बन गई। लौहपथगामिनी (रेलगाड़ी) और कंठलंगोट (टाई) जैसे रघुबीरी शब्द या उन के मज़ाक़ बनाए गए। यह बात नज़रअंदाज़ कर दी गई कि शब्द जनता बनाती है, कारीगर बनाते हैं, विद्वान नहीं।

जो भी हुआ पंडिताऊ जकड़न से हिंदी छूटी, आधुनिक भाषा बनने के रास्ते तलाशने लगी।

रघुबीरी से विद्रोह कर आजकल हिंदी में अँगरेजी शब्दों की रेलपेल शुरू हो गई है। सभी अँगरेजी शब्द हमेशा को इस में रहेंगे, ऐसा नहीं है। एक बैलेंस हो कर रहेगा।

हिंदीकरण के चक्कर में हम पिछड़ जाएंगे

लेकिन एक बात ज़रूर कही जानी चाहिए–

किसी तकनीकी शब्द का अनुवाद करके उसे प्रचलित करने में जितना समय बरबाद जाता है, उतनी देर में कई गुना नए तकनीकी शब्द और पैदा हो जाते हैं। किसी ज़माने में सीडैक में जिस्ट कार्ड और इसफ़ौक फ़ौंट बना कर भारत की सारी लिपियों को जोड़ने वाले, शब्द तकनीक में क्रांति लाने वाले श्री मोहन तांबे ने मुझ से पुणें में एक बार कहा था। भारत सरकार कंप्यूटर भाषा को पूरी तरह हिंदी में करने के लिए जो ज़ोर दे रही है, वह देश के लिए घातक सिद्ध होगा। जब तक हम किसी एक प्रोग्राम को हिंदी में करेंगे, तब तक बीसियों नए विकसित प्रोग्राम बन जाएँगे, और हम पुराने प्रोग्रामों के हिंदी संस्करण बनाते पाए जाएँगे। अच्छा है कि वह कार्यक्रम अपनी मौत मर गया है। माइक्रोसौफ़्ट ने वर्ड आदि में इंटरफ़ेस मात्र हिंदी का किया है। भाषा तो सब के पीछे वही कंप्यूटर की डिजिटल भाषा है। और मेन कमांड अभी तक अँगरेजी में हैं।

यहाँ एक बात और ध्यान देने की है। हमारा अँगरेजी विरोध एक पराधीन देश का शासक देश की भाषा के विरुद्ध था। आज हालत बदल चुकी है। अँगरेजी मात्र इंग्लैंड की भाषा नहीं है। वह अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों की भाषा है। यूरोप के देश भी अँगरेजी माध्यम से यूरोपीय यूनियन का काम चलाने की कोशिश में हैं। अँगरेजी के कट्टर दुश्मन फ़्राँस तक ने बच्चों को अँगरेजी पढ़ाने की दिशा में क़दम उठाए हैं। इसलिए मैं समझता हूँ कि आज मेरा 47 वाला अँगरेज़ी विरोध बेमानी है। आज अँगरेजी हमारे लिए दुनिया तक पहुँचने की सीढ़ी है। जब निम्न वर्ग के लोग भी निजी उन्नति के लिए बच्चों को अँगरेजी पढ़ा रहे हैं, तो हमारी दैनिक बोली में उस के शब्द आएँगे ही, लेखन में भी, अख़बारों में भी।

इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर मेरे पास यह लिखने के लिए कुल कुछ मिनिट हैं। इसलिए इतना लिख कर ही मैं संतोष करता हूँ।

 

–अरविंद कुमार

सी-18 चंद्र नगर, ग़ाज़ियाबाद 201011

samantarkosh@gmail.com

 

 

 

alok putul <alokputul@gmail.com>

आदरणीय अरविंद जी,

हिंदी पत्रकारिता की लानत -मलामत और रोना -धोना करके फ़िलहाल अपना और आपका वक़्त जाया करने के बजाय सीधे -सीधे एक सूचना आपके साथ साझा कर रहा हूं . हम कुछ पत्रकार साथी मिलकर एक नई वेबसाइट रविवार की शुरुवात कर रहे हैं. मूलतः एक हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्रिका  की शक़्ल वाले इस वेबसाइट का संयोजन रायपुर, छत्तीसगढ़ के साथी नीरज कर रहे हैं . वेबसाइट के लिए सामग्री जुटाने का ज़िम्मा   देश भर में फैले ऐसे साथियों पर है, जो मीडिया के विविध माध्यमों से जुड़े हुए हैं.  पहला अंक 15 अगस्त तक तैयार करने की योजना है.

ज़ाहिर है, इसके लिए हम आपका भी रचनात्मक सहयोग चाहते हैं.

क्या यह संभव होगा कि पिछले 60 सालों में शब्दों को बरतने के मामले में हिंदी समाज का रवैय्या कैसा रहा है, इसको लेकर लगभग 700-1000 शब्दों की एक टिप्पणी आप कृपापूर्वक लिख सकें ?

मैं आपके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूं.

सादर आपका

आलोक


ALOK PRAKASH PUTUL     ……………………………………………………………………………………
Deshbandhu complex, Jarhabhata, Bilaspur, Chhattisgarh, INDIA 495 001
ph- +91 7752 238336/ 409555 Cel- +91 94252 20625

 

 

 (इस लेख और पत्रव्यवहार पर कोई तारीख़ नहीँ है. एक बात साफ़ है, यह 2007 मेँ 15 अगस्त के आसपास लिका गया होगा, –अ.कु. 23 फ़रवरी 2011)

 

आज ही http://arvindkumar.me पर लौग औन और रजिस्टर करेँ

©अरविंद कुमार

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