clip_image002.jpg

दारा शुकोह

In History, People, Reviews, Spiritual by Arvind KumarLeave a Comment

इतिहास का उलझा सवाल

دارا شكوه

रंगीन मुग़ल त्रासदी

शाह आलम के बाद दाराशुकोह श्री मेवाराम का दूसरा उपन्यास है. दोनोँ का विषय मुग़लिया हिंदुस्तान है. उपन्यास मेँ लेखक का ज़ोर दारा के वैचारिक विकास का वर्णन करने पर है. विषय को शुष्क होने से बचाने के लिए मुग़ल दरबार की रंगीनियोँ के ढेरोँ क़िस्सोँ के साथ साथ अनेक दिलचस्प कहानियाँ और घटनाएँ बयान करने का सहारा लिया गया हैये पाठक को आगे पढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती हैँ.

 

clip_image002तू काबा मेँ है और तू सोमनाथ के मंदिर मेँ है / तू चैत्यालय मेँ है और तू सराय मेँ है / तू ही एक समय पर प्रकाश भी है और पतिंगा भी है / तू ही हाला और तू ही प्याला / तू ही कवि और मूर्ख, मित्र और अपरिचित व्यक्ति भी है / तू ही गुलाब और उस से प्रेम करने वाली बुलबुल भी है / तू ही स्वयं अपने सौंदर्य के प्रकाश के पास का पतिंगा है

दारा शुकोह (तारीक़त-उल-हक़ीक़ा)

बादशाह का न तो कोई भाई होता है और न कोई रिश्तेदार. बादशाह को केवल ताजो-तख़्त नज़र आता है और ताजो-तख़्त की हिफ़ाज़त की ख़ातिर वह किसी हद तक क़दम उठा सकता है

— (नूरजहाँ के समर्थकोँ के नाश के समाचार पर) शाहजहाँ का एक संवाद

 

लगभग 99 प्रतिशत स्थानोँ पर जो दारा शिकोह नाम से लिखा और जाना जाता है, उसे हिंदी मेँ संभवतः पहली बार सही तरह शुकोह लिखने के लिए श्री मेवाराम बधाई के पात्र हैँ. शुकोह का अर्थ है शानशौक़त, ऐश्वर्य, रौबदाब. दारा शुकोह यानी ऐश्वर्य का सम्राट दारा. जब कि शिकोह का मतलब है त्रास, भय, डर; तब दारा शिकोह मतलब होता है आतंकी दारा. शाहजहाँ और मुमताज महल अपनी तीसरी संतान और पहले चहेते बेटे का नाम दारा शुकोह ही रख सकते थे. कमाल यह है कि अनगिनत लोग बिना जाने समझे शुकोह को शिकोह कहे और लिखे जा रहे हैँ! इंग्लिश मेँ भी तमाम जगह Dara Shikoh है, Dara Shukoh कहीँ नहीँ. हाँ, मराठी मेँ हर जगह दारा शुकोह है. उर्दू लिपि मेँ अधिकतर लेखक स्वरोँ के मात्रा चिह्नोँ का प्रयोग नहीँ करते. नतीज़तन पाठक लिखित शकोह (شكوه) को शिकोह या शुकोह पढ़ सकता है. और दारा के साथ ऐसा ही हुआ भी है. (तमाम ऐतिहासिक ग्रंथोँ और पूरे इंटरनैट पर दारा का सही नाम डालने की मुहिम चलाना बेहद ज़रूरी है.)

शाह आलम के बाद दाराशुकोह श्री मेवाराम का दूसरा उपन्यास है. दोनोँ का ही विषय मुग़लिया हिंदुस्तान है. वर्तमान उपन्यास मेँ लेखक का ज़ोर दारा के वैचारिक विकास का वर्णन करने पर है. विषय को शुष्क होने से बचाने के लिए उन्होँ ने मुग़ल दरबार की रंगीनियोँ के ढेरोँ क़िस्सोँ के साथ साथ अनेक दिलचस्प कहानियाँ और घटनाएँ बयान करने का सहारा लिया हैये पाठक को आगे पढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती हैँ.

लेखक किसी वैज्ञानिक अनुसंधान कर्ता की तरह पूरी तरह शोध कर के, इतिहास ग्रंथोँ के साथ साथ मुग़लकालीन दस्तावेजोँ और सामयिक ब्यौरोँ से हर तरह की जानकारी हासिल कर के किसी अच्छे तटस्थ रिपोर्टर की तरह तत्कालीन घटनाओँ का तथ्यपरक चित्रात्मक ब्यौरा पाठकोँ के सामने परोसता है. युद्धोँ के वर्णन मेँ वह मौसम की बारीक़ियोँ तक पर जाता है. उस ने अपनी भूमिका तय कर ली है. समकालीनोँ जैसा वर्णन करना, लेकिन भूल कर भी संपादकीय मंतव्य न देना. अपनी तरफ़ से वह न किसी पात्र की प्रशंसा करता है न निंदा. वह किसी घटना पर कोई भी निजी टिप्पणी या विचार व्यक्त नहीँ करता. कथापात्र एक दूसरे के क्रियाकलापोँ पर अपनी राय ज़रूर देते नज़र आते हैँ, यह वैसा ही है जैसे कोई निष्पक्ष रिपोर्टर किसी घटना पर भिन्न लोगोँ की प्रतिक्रिया जनता के सामने रखे. अपनी क़लम से तो उस ने किसी भी स्थल पर कथानायक दारा की प्रशस्ति तक नहीँ गाई है. यह काम तो राजामहाराजाओँ के भाटोँ का या बादशाहोँ के दरबारी इतिहास लेखकों का हुआ करता था!

सतरहवीँ सदी के प्रथम भाग मेँ शाहजहाँ का अभागा वली अहद दारा शुकोह आज लगभग चार सौ साल बाद भी इक्कीसवीँ सदी के मुहाने पर अकेले भारत ही नहीँ, पाकिस्तान और बांग्लादेश को मिला कर तमाम हिंदोस्तान के, दक्षिण एशिया के इतिहास का, और वर्तमान का, एक जीवंत लेकिन उलझा सवाल है. इतिहासकार, चिंतक और विचारक ही नहीँ, आम लोग भी, उस के चरित्र से, उस की बौद्धिकता से अभिभूत हैँ. उस की संभावनाएँ और असफलताएँ अनोखी जिज्ञासाओँ और निराशाओँ का विषय हैँ. यह भी है कि आज के अंतरराष्ट्रीय और हमारे अपने संदर्भ मेँ धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक टकरावोँ से जूझने के लिए भी दारा की उलझनोँ को समझना और उन से सबक़ लेना ज़रूरी हो गया है.

इन मेँ से सब से बड़े टकराव हैँ इस्लाम के भीतर होने वाले अंतर्द्वंद्वोँ के टकरावऔर यह सवाल कि इस्लाम क़ौम है या मज़हब जिस के आधार पर भारत का बँटवारा हुआ. इस सवाल को ले कर गरमागरम बहस आज तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान मेँ चलती रहती है. यह बहस भी कि बँटवारा होना चाहिए भी था या नहीँ. पाकिस्तान मेँ दारा के जीवन के बहाने इस बहस को आगे बढ़ाने वाला एक बहुचर्चित, बहुसमीक्षित और विवादास्पद नाटक भी खेला गया था.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज इस्लाम पर आरोप लगाया जाता है कि वह किसी भी अन्य सभ्यता के साथ स्थायी सहअस्तित्व मेँ यक़ीन नहीँ रखता. इस दृष्टिकोण को पिछली दो सदियोँ से इस्लाम के भीतर बढ़ते उग्रवाद की प्रतिक्रिया भी कहा जा सकता है. जवाब मेँ यह भी कहा जा सकता है कि इस्लामी उग्रवाद एशियाई सभ्यताओँ पर बढ़ते और ज़बरन बढ़ाए जाते पश्चिमी प्रभाव का जवाब है. और फिर पश्चिम वाले कहेँगे कि मध्य युगोँ मेँ स्पेन तक लहराने वाले इस्लामी परचम का जवाब था पश्चिमी प्रसार.

यही बात हिंदोस्तान के संदर्भ मेँ कही जा सकती है. यहाँ हिंदु और मुस्लिम दंगोँ का, जद्दो जदल का, इतिहास पुराना है. इस्लामी शासकोँ मेँ मंदिरोँ का ध्वंस (मिस्मार बुतख़ाना किया) और गाज़ी बनना शान की बात समझे जाते रहे हैँ. (बाबरी मस्जिद का ध्वंस उसी के बदले के नाम पर किया गया.)

गड़े मुर्दे उखाड़ते रहेँ तो यह सिलसिला कभी ख़त्म नहीँ होगा. दुनिया पिछले ज़मानोँ मेँ किए गए अपराधोँ और अत्याचारोँ की बहस और इंतक़ाम के कुचक्र मेँ हमेशा फँसी रहेगी. भविष्य अधर मेँ लटकता झूलता और भटकता रहेगा. वस्तुस्थिति यह है कि आज किसी सभ्यता को न तो नेस्तनाबूद किया जा सकता है, न यह दरकार है. दंगोँ से मुक्ति पाने की इच्छा और सहअस्तित्व आंदोलन भी चलते रहे हैँअकबर ने दीने इलाही मज़हब चला कर सर्वधर्म समभाव की तरफ़ गंभीर क़दम उठाया और सुल्ह कुल (संपूर्ण शांति) स्थापित करने की कोशिश की. अकबर के पड़पोते दाराशुकोह ने अकबर के मृतप्राय दीने इलाही को तो न अपनाया, लेकिन हिंदु-मुस्लिम मैत्री और परस्पर सद्भाव को बौद्धिक आधार देने की जीतोड़ मेहनत की. यह वही रास्ता है जो हमारे समय मेँ महात्मा गाँधी ने अपनाया

 

उपन्यास लिखने से पहले लेखक के मन मेँ शाहजहानी काल की रहस्यमयी नर्तकी राणादिल के बारे मेँ जानने की इच्छा थी. उस ने सुना था कि वह दारा की हिंदू पत्नी भी थी. कहीँ वह कोरी कपोलकल्पना तो नहीँ है या वह सचमुच थी, इतिहास मेँ उस की क्या भूमिका थी…? और एक रात राणादिल लेखक के सपने मेँ आ जाती है और अपने ऐतिहासिकता के सूत्र मुहैया करती है. इस पहली ऐंट्री के बाद राणादिल काफ़ी देर बाद हमेँ मिलती है, लेकिन पाठक उस का इंतज़ार उत्सुकता से करने लगता है

यही है उपन्यास का आरंभ स्थल. और घटना काल है शाहजहाँ की ताजपोशी (1628) से उस की मृत्यु (1666) तक का काल. अंत होता है उपसंहार से. मुख्य घटनाक्रम है शाहजहाँ और मुमताज महल के चारोँ बेटोँ दाराशुकोह, मुरादबख़्श, शाह शुजा और औरंगज़ेब के बीच सत्ता संघर्ष और बेटियोँ जहाँआरा और रौशनआरा की राजनीतिक षड्यंत्रोँ मेँ सक्रिय सहभागिता. शाहजहाँ की आँखोँ का नूर है दाराशुकोह, प्यारी बेटी है जहाँआरा. ये दोनोँ शाहजहाँ के मुख्य सलाहकार के रूप मेँ अकसर दिखाई देते हैँ. पड़दादा अकबर की तरह दारा की आँखोँ मेँ सुल्ह कुल (संपूर्ण शांति) की सुनहरी आशा है और तमाम उच्च आदर्शोँ से भरे सपने हैँ. वह अपने तरुण-यौवन के उत्कट उत्साह मेँ अपने आदर्शोँ की दुनिया मेँ ही खोया रहना चाहता है, दर्शन शास्त्र के अध्ययन, पुस्तक लेखन, चित्रकारी जैसी कलाओँ के प्रोत्साहन मेँ मगन रहता है. कंदहार के रणक्षेत्र मेँ भी वह अपना कुतुबख़ाना साथ ले जाना नहीँ भूलता और अपनी सैद्धांतिक लड़ाइयोँ की तैयारी मेँ मशग़ूल रहता है. सर्वधर्म समभाव के प्रति उस का लगाव, हिंदू विद्वानोँ से उस की मित्रता, इस्लाम और हिंदू धर्म के मूल तत्त्वोँ मेँ समानता खोजने की उस की कोशिशेँ कठमुल्लाओँ मौलवियोँ को फूटी आँखोँ नहीं सुहातीँ. बात यहाँ तक पहुँचती है कि उस के सत्ता मेँ आ जाने की संभावना मेँ उन्हेँ भारत मेँ इस्लाम का अंत नज़र आने लगता है. औरंगज़ेब को इन सब का खुला समर्थन प्राप्त है और वह बड़ी समझदारी से इन्हेँ अपनी साज़िशोँ मेँ शामिल कर के पूरा लाभ उठा कर गद्दीनशीन हो जाता है.

शुभचिंतक — स्वयं पिता शाहजहाँ और एक साल बड़ी बहन जहाँआरा बेगम — दारा को बारबार समझाते हैँ कि राजकाज, युद्धकला और कूटनीति मेँ दक्षता शासकोँ के लिए ज़रूरी है. पर दारा के लिए बस इतना विश्वास ही काफ़ी है कि राजपाट उसे ही मिलेगा और वह अपने पड़दादा अकबर महान से आगे बढ़ कर संसार को कुछ दे कर जाएगा. उस के लिए कूटनीति से बड़ी चीज़ है प्रेम, मानव प्रेम, अंतर्धर्म विवाहमानोँ इन्हीँ से दुनिया मानवीयता के मार्ग पर चलने लगेगी!

उसे सब पर भरोसा है, वह समझ ही नहीँ पाता कि लोग जो मुँह पर कहते हैँ, ख़ुशामदेँ करते हैँ, ज़रूरी नहीँ है कि वह सब सही हो और वे उस पर अमल भी करेँ. मौक़ा आने पर वे अकसर उस का उलटा ही करते हैँ. दारा सहज विश्वासशील व्यक्ति है, दयालु है, क्षमाशील है और इसी कारण सम्राट होने लायक़ नहीँ है — यह बात लेखक के कहे बग़ैर पाठक हर नए पृष्ठ को पलट कर मन मेँ डालता रहता है. हमारे मन मेँ आने वाली त्रासदी का ख़ौफ़नाक़ चित्र बनता जाता है.

प्रस्तुत हैँ शाहजहाँ और दारा के बीच कुछ संवाद –

अभी कुछ महीने पहले आप की किताब मज्मुअ-अल-बहरीन ने शहर के तमाम मुल्लाओँ की नीँद उड़ा दी थी. अभी यह आग ठंडी नहीँ हुई थी कि माबदौलत ने सुना है आप हिंदुओँ के वेदोँ का फ़ारसी मेँ तरजुमा करा रहे हैँआजकल सारा दिन आप के कुतुबख़ाने मेँ यही काम हो रहा है

अब्बाहुज़ूर, मैं कितनी बार कह चुका हूँ मुझे इन ज़ाहिल उलेमाओँ और मुल्लाओँ की कोई परवाह नहीं

बेटे, आप समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैँ. आप अपनी ताक़त और अपने दिमाग़ का कोई फ़ायदा नहीँ उठा रहे हैँ, उल्टे अपना नुक़्सान कर रहे हैँ. उधर आप के ख़िलाफ़ भाई तमाम साज़िशेँ रच रहे हैँ. बेटे, हिंदुस्तान का ताज़ो तख्त आप से दिन-ब-दिन दूर होता जा रहा है. लेकिन आप की समझ मेँ कुछ नहीँ आ रहा है

बाहशाह ने सोच लिया शहज़ादे को समझाना तक़रीबन नामुमकिन है. फिर भी उन्होँ ने एक बार और कोशिश की

बेटे, बादशाहोँ का ताजो-तख़्त वही हासिल कर सकता है जिस के हाथोँ मेँ ताक़त हो, ताक़त. बेटे, आप अपनी ताक़त को समझो और दरबार के तमाम शिया, सुन्नी, अफ़गानी, और दूसरे मनसबदारोँ का दिल जीतने की कोशिश करो. जहाँ तक हो सके इन मुल्लाओँ और उलेमा हज़रात के ख़िलाफ़ कुछ मत बोलो

लेकिन दारा मुल्लाओँ के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम ज़ारी रखता है. एक शेर मेँ वह कहता है बिहिश्त आँ जा कि मुल्ला-ए न बाशद, जि मुल्ला शोरो ग़ौगा-ए न बाशद (जन्नत वहीँ है जहाँ मुल्ला नहीँ होता. जहाँ मुल्ला का शोरग़ुल नहीँ सुनाई देता.)

clip_image003

 

राणादिल भी समझाने की कोशिश करती है

हुज़ूर, आप से एक अर्ज़ हैन हो तो कुछ दिनोँ के लिए आप भी छोटे शहज़ादे औरंगज़ेब की तरह अपने को बना लेँ. हवेली और मंज़िले निगम बोध घाट से तमाम पंडितोँ को कुछ दिनोँ के लिए सेवा से अलग कर शाहजहानाबाद से बाहर कहीँ उन का इंतज़ाम करा देँकुछ दिनोँ के लिए अपनी यह प्रभु शब्द वाली अँगूठी उतार देँआख़िरी इल्तजाआप अपनी प्रभु शब्द यह पेटी आगे न पहनेँ

बेगम राणादिल, मैँ ने कभी नहीँ सोचा था, आप इतनी कमज़ोर पड़ जाएँगीमैँ बहरूपिया नहीँ हूँ जो रोज़ाना अपनी शक़लेँ बदलूँ…, मैँ शाहबुलंद इक़बाल वलीअहद शहज़ादा मुहम्मद दारा शुकोह हूँचाहे जान ही क्योँ न चली जाएमैँ अपने को नहीं बदल सकता

1657 मेँ शाहजहाँ की बीमारी ने मुग़ल गद्दी के लिए भाइयोँ की लड़ाई मेँ एक तात्कालिकता ला दी. शाहजहाँ की हालत बिगड़ती जा रही थी. पेशाब मेँ जलन के कारण बादशाह दर्द के मारे चीखने लगेपेशाब बंद हो गया, कई दिन तक पाख़ाने नहीँ गएखाना पीना छूट गयापैरोँ मेँ सूजन आ गई, जीभ और तालू सूखने लगे. बुख़ार ने आ दबोचा. सन्नाटा छा गया. ठीक होने की उम्मीद न रही. दरबार दो गुटोँ मेँ बँट गया. अगला बादशाह कौन होगाजहाँआरा ने दारा को व्यावहारिक सुझाव दिया

बादशाह की हालत ठीक नहीँ है, आप कल सुबह ताज पहन लेँ और हुकूमत फौरन सँभालेँ

आदर्शवादी दारा ने जवाब दिया

चाहे जो कुछ भी हो हम ऐसा नहीँ करेंगे

शाहजहाँ के स्वास्थ्यलाभ के बाद हालात बेहद बिगड़ गए. दाराशुकोह ने औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ जंग के लिए कूच की तैयारी शुरू कर दी. शाहजहाँ ने दारा को जंग की सफलता के लिए व्यावहारिक सुझाव दिया

औरंगज़ेब को बल्ख़-बदख़्शाँ, कंदहार, बुंदेलखंड और दकन की लड़ाइयोँ का अच्छा ख़ासा तजुरबा हैउस की फ़ौज़ ने थरमत का मैदान अभी फ़तह किया है. उस की फ़ौज़ जोश-ओ-ख़रोश के साथ लड़ने को तैयार है. बेटे, अच्छा हो वक़्त की पुकार सुन कर औरंगज़ेब और मुरादबख़्श से समझौता कर लिया जाए

लेकिन दाराशुकोह का जवाब था

आलाहज़रत, गुस्ताख़ी माफ़ हो. होने वाली जंग थरमत की जंग नहीँ है, जिसमेँ नातजुरबेकार महाराजा जसवंतसिंह मैदान-ए-जंग से भाग निकले थे. इस जंग मेँ भाईजान औरंगज़ेब को छठी का दूध याद आ जाएगा.

बेटे, आप समझने की कोशिश करेँ. जंग जीतना आसान नहीँ होता. आप नातजुरबेकार हैँ. आपने क़ीमती वक़्त तमाम किताबोँ मेँ ही गुज़ारा है. अफ़सोस, मैदान-ए-जंग का आप के पास वह तजुरबा नहीँ है जो औरंगज़ेब के पास है

आलाहज़रत, आप फ़िक्रमंद न होँ. हमेँ सात दिन का मौक़ा देँजंग जीत कर भाईजान औरंगज़ेब और मुरादबख़्श को गिरफ़्तार कर आप के क़दमोँ मेँ डाल देँगे

बादशाह काफ़ी देर ख़ामोश रहे. उन्हें चंबल के रेतीले मैदान दिख रहे थे. वे बोले

बेटे, माबदौलत आप की ज़िद देख कर जंग की इज़ाज़त दिए देते हेँलेकिन जंग की कमान आप के हाथोँ मेँ नहीं रहेगी… . इस जंग की कमान माबदौलत के हाथोँ मेँ होगी

बेटे, आपने हमारी नेक सलाह नहीँ मानीमाबदौलत के हाथोँ मे जंग की कमान होनी चाहिए थी. ख़ैर बेटा, तुमने अपनी मर्ज़ी का काम कियाख़ुदा तुम को सुर्ख़रू और कामयाब करे, लेकिन याद रखना, अगर जंग बिगड़ गई तो माबदौलत को क्या मुँह दिखाओगेमाबदौलत की राय बूँदी के राजा राव शत्रुसाल से क़तई अलग नहीँ है. लेकिन जब तुम ने जंग लड़ने की ठान ही ली है तो तुम्हारे लिए अल्लाह से दुआ करता हूँ कि दुश्मन को नेस्तनाबूद करते हुए फ़तह का झंडा बुलंद करो

दीवाने आम मेँ आ कर बादशाह ने दाराशुकोह को एक बार फिर समझाने की कोशिश कीवह नहीँ मानाशहज़ादे का रथ जैसे ही ओझल हुआ, बादशाह दीवाने आम मेँ रो पड़े

नतीजा वही हुआ जो आज सारी दुनिया जानती हैआगरा से 12-13 किलोमीटर दूर सामूगढ़ मेँ दारा को करारी हार मिली. दर दर भटकने को मज़बूर हुआ, फिर से सिर उठाने की तमाम कोशिशेँ नाकाम रहीँबचते भागते रास्ते मेँ नादिरा बेगम की मृत्यु हो गईअंततः उसी पठान मलिक जीवन ने जिसकी कभी दारा ने जान बचाई थी, दारा को औरंगज़ेब के हवाले कर दिया. दिल्ली मेँ फटेहाल दारा को चाँदनी चौक मेँ हाथी पर निकाला गया. नागरिक उस पर फूल बरसा रहे थे, साथ चल रहे मलिक जीवन पर गंद फेँका जा रहा था. बाद मेँ दारा का सिर क़लम कर दिया गयाऔरंगज़ेब ने दारा का कटा सिर जड़ाऊ संदूक़ मेँ शाहजहाँ के पास उपहार के तौर भिजवा दिया

उपसंहार मेँ मेवाराम सभी पात्रोँ की परिणति का ज़िक्र करते हैँ, जहाँआरा की अवनति और रौशनआरा की उन्नति तो बताते हैँ, यह बताना भूल जाते हैँ कि कुछ समय बाद जब महदोश रौशनआरा अपने एक प्रेमी के साथ पकड़ी गई तो उस के सारे अधिकार छीन लिए गए और जहाँआरा को सौंप दिए गए

उपन्यासकार ने दारा पर पड़े वैचारिक प्रभावाओँ और उस की निजी मान्यताओँ का विशद चित्र खींचा है. यही उपन्यास का मुख्य कथ्य है. दारा सूफ़ियोँ के क़ादिरी संप्रदाय को मानने वाला है. उस पर मियाँ मीर का गहरा असर है. यह वही मियाँ मीर हैँ जिन के हाथोँ गुरु अंगददेव ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की नीवँ रखवाई थी और जो सिखोँ के प्रमुख संतोँ मेँ गिने जाते हैँ. लाहौर मेँ मियाँ मीर ने मौलाना जमालुद्दीन रूमी के जो कुछ छंद सुनाए उन का दारा पर गहरा प्रभाव पड़ा:

ऐ मुसलमानो, मैँ क्या करूँ! मैँ तो अपने आप को नहीँ पहचान पा रहा हूँ. मैँ न ईसाई हूँ, न यहूदी और न मुसलमान. मैँ न पूरब का हूँ, न पश्चिम का, न ज़मीन का और न सागर का. मैँ प्रकृति की टकसाल का भी नहीँ हूँ, न और न आसमानोँ का. न मैँ पृथ्वी का हूँ, न जल का, न पवन का, न पालक का. मैँ न तीनोँ लोक का हूँ, न मिट्टी का, न अस्तित्व का, न सत्ता का. मैँ न हिंदुस्तान का हूँ, न चीन का और न बुल्गेरया का. न मैँ इराक़ का हूँ और न खुरासान देश का. मैँ न इस जगत का हूँ न उस जगत का. न मैं स्वर्ग का हूँ, न नरक का.

न यहाँ शरीर ही है और न आत्मा ही. क्योँकि मैँ प्रियतम की आत्मा का हूँ. मैँ ने तमाम गुणोँ को दूर हटा दिया है. क्योँकि मैं जानता हूँ कि दोनोँ जगत एक ही हैँ. मैँ उसी एक खोजता हूँ, उसी एक को जानता हूँ, उसी एक को देखता हूँ और उसी को पुकारता हूँ. शहज़ादे, वह आदि है, वह अंत है, वह बाह्य है और वह अनंत है.

ऐ मुसलमानो, इस दुनिया मेँ अगर कोई प्रेमी है तो वह मैँ हूँ. अगर कोई ईमान लाने वाला है अथवा काफ़िर है अथवा ईसाई संत है तो वह मैं हूँ. साक़ी, गायक, वीणा, संगीत, माशूक़. शमा, शराब, शराब की मस्ती, सब कुछ मैँ ही हूँ.

मैँ परमात्मा की क़सम खा कर कहता हूँ कि हर मज़हब और संप्रदाय मैँ हूँ. पृथ्वी, हवा, जल, और अग्नि ही नहीँ, बल्कि शरीर और आत्मा भी मैं हूँ. सत्य-असत्य, भला-बुरा, आराम और तकलीफ़ शुरू से आख़िर तक मैँ ही हूँ. मैँ ही ज्ञान, विद्या, फ़क़ीरी, पुण्य और ईमान हूँ.

तुम निश्चय जान लो कि लपटोँ सहित नरकाग्नि और स्वर्ग, नंदन कानन तथा हूरेँ मैँ ही हूँ. इस पृथ्वी और आसमान मेँ जितना कुछ भी है, देवदूत, परी, जिन्न, और मनुष्य मैँ ही हूँ

अपनी चौथी किताब मज़्मुअ-उल-बहरीन (दो समुद्रोँ का संगम) के बारे मेँ दारा शाहजहाँ को बताता है

मैँ इस किताब मेँ हिंदू और मुसलमान मज़हब को एक तराज़ू मेँ तौल कर हिंदुस्तान की तमाम अवाम की आँखेँ खोलना चाहता हूँ. हिंदू और मुसलमान मज़हब दोनोँ तक़रीबन एक ही हैँ. ईश्वर और अल्लाह के वास्ते इन मज़हबोँ की किताबोँ मेँ जो कुछ दिखाया गया है उस मेँ बहुत कुछ समानता है. आम इनसान और हमारे मज़हबी मुल्ला इन मज़हबोँ के ऊपरी स्वरूप को ही देख रहे हैँ. उन्हेँ इन मज़हबोँ की किताबोँ के अंदर गहराई से जा कर देखना होगा. दोनोँ मज़हब अल्लाह के पास जाने का एक ही रास्ता दिखाते हैँ और मैँ अपनी अगली किताब मेँ तमाम दुनिया को हिंदू और मुसलमान मज़हब की बारीक़ियोँ को सामने रख कर ऐसा रास्ता दिखाऊँगा, जिस मेँ तमाम दुनिया के हिंदू और मुसलमान वेदोँ और क़रआल रीफ़ की बराबर इज्ज़त करेँ और उनके गूढ़ रहस्योँ को समझेँ

उपन्यास मेँ कई रोचक प्रसंग शामिल किए गए हैँ, जो अपने आप मेँ स्वतंत्र उपन्यास भी बन सकते है.

- दरबारी कवि पंडित जगन्नाथ और लवंगी बेगम की प्रेम कहानीशाहजहाँ की मौन स्वीकृति से उन का विवाह और बनारस चले जानायह वही विद्वान कवि जगन्नाथ हैँ जिन्होंने भविष्य मेँ गंगालहरी की रचना की)

- शाहजहाँ की बेटी चमनी बाई और जबलपुर के पास रामनगर के गोंडवाना राजा हृदय शाह के प्रेमभरे अफ़साने और भाग जाना

- औरंगज़ेब और दिलरसबानू की बेटी शायरा ज़ेबुन्निसा का विरही जीवन

- दकन मेँ औरंगज़ेब और हीराबाई (ज़ैनाबादी) की प्रेमकहानीवह शाहजहाँ के साढ़ूभाई सैफ़खाँ यानी औरंगजेब के मौसा की रखैल थी, जो औरंगज़ेब ने हासिल कर ली. ज़ैनाबादी के इसरार पर औरंगज़ेब शराब का प्याला मुँह से लगा लेता है लेकिन आखिरी वक़्त ज़ैनाबादी हाथ मार से वह प्याला दूर झटक देती है

- मुरादबख़्श और नर्तकी सरसबाई की प्रेम कहानी

- जहाँआरा बेगम का पहले नजाबत खाँ के प्रति मोह और बाद मेँ बूँदी के राजा शत्रुसाल (छत्रसाल) से मोहब्बत

शत्रुसाल जन्नत से आया हुआ शाहज़ादा दिख रहा था. दीवाने आम की सीढ़ियोँ से ऊपर क़दम रखते ही उस ने बादशाह सलामत को तीन बार शाही कोर्निश कीलगता था उस ने शाही दरबार के अदब क़ायदे ठीक से सीख रखे हैँतख़्त के सामने पहुँच कर उस ने बादशाह से नज़रेँ मिलाने के बाद पहले की तरह दोबारा तीन बार कोर्निश बजायीदारा शुकोह को कोर्निश बजायीऔरंगज़ेब और नन्हे शहज़ादे मुरादबख़्श को भी कोर्निश बजायी.सभी दरबारियोँ की नज़र उस के ख़ूबसूरत चेहरे पर लगी थीबादशाह इस नवयुवक के रूप पर ख़ुद मोहित हो उठेजहाँआरा की नज़रेँ इस नवयुवक राजा के चेहरे पर इस क़दर गड़ी हुई थीं कि हटने का नाम ही नहीँ ले रही थीँ

शत्रुसाल ने दारा के लिए लड़ते लड़ते जान गँवाई

- रौशनआरा की महल मेँ ऐय्याशियाँ

- शाहजहाँ की ऐय्याशियाँ. उस की ढेरोँ बेगमेँईरानी बेगम (कंदहारी बेगम सफ़वी बेगम) तो मुमताज से पहले की बेगम थी, बाद मेँ बग़दादी बेगम (मोती बेगम), बलूची बेगम (सरहिंदी बेगम), अकबराबादी बेगम (पुराना नाम अजीजुन्निसा) की बेटी ऐय्याश सुरैय्या बेगम, परवेज़जहाँ बेगम, अब्दुर्ररहीम ख़ानख़ाना की पोती, बाँदी से बेगम बनी अज़ीज़ाबादीख़ास रखैलें– ख़लीलुल्ला ख़ाँ की बेगम हमीदा बानू, ज़ाफ़र ख़ाँ की बेगम फ़रजाना

कुछ रोचक पात्र हमेँ बस एक दो पैराग्राफ़ के लिए मिलते हैँ.

- नादिरा बेगम से दारा का निकाह कराने वाला काज़ी

रात के दो पहर और एक घड़ी बीत जाने के बाद मुल्ला काज़ी मुहम्मद असलम को निकाह के लिए बुलाया गया. यह मुल्ला बहुत ही कट्टर सुन्नी था. एक बार जब वह काफ़ी बीमार पड़ गया तो किसी शाही हकीम ने उसे नुसख़ा दिया और कहा, इस नुसख़े के मुताबिक़ दवा लेते ही आप जल्दी अच्छे जाएँगे. जब उसे मालूम हुआ कि नुसख़ा शिया हकीम के द्वारा तैयार किया गया है तो उस ने नुसख़े को जलवा दिया.

-    ज्योतिषी घासीराम और उस की कर्णपिशाचिनी सिद्धि…

-    मेहनती और ईमानदार वज़ीर रघुनाथ राव जो सुबह सुबह अपने पास आने वाले पहले फ़रियादी की मदद करने की कोशिश करता है, चाहे वह कितना ही ग़लत आदमी क्योँ न हो

-    उपन्यास मेँ अँगरेज पीटर मंडी, निकोलाई मनूची, बर्नियर जैसे कई यूरोपीय पात्र भी हैँ.

उपन्यास हमारे मन मेँ कुछ सवाल छोड़ जाता है. क्या होता यदि दाराशुकोह–

-    बादशाह बन जाता? क्या वह सफल शासक सिद्ध हो पाता? तब आज का हिंदोस्तान क्या होता?

-    बादशाह बनने का ख़्वाब त्याग देता और सूफ़ी संत बन कर धार्मिक एकता का प्रचार प्रसार करता?

क्या तब भी औरंगज़ेब उसे जीने देता?  ◉◉◉

 

 

दाराशुकोह

ऐतिहासिक उपन्यास

लेखक: मेवाराम

प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ

18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली 110 003

पृष्ठ संख्या: 868 मूल्य: रु. 600.00

Comments